धन – वैभव, जात-पात नहीं ईश्वर को केवल शबरी जैसे भक्त की सच्ची भक्ति पसंद है-डॉ विवेकनिष्ठ स्वामी जी*
फ़ास्ट न्यूज़ जनता की आवाज़ संपादक सज्जाद खान

*धन – वैभव, जात-पात नहीं ईश्वर को केवल शबरी जैसे भक्त की सच्ची भक्ति पसंद है-डॉ विवेकनिष्ठ स्वामी जी*



श्री रामचरितमानस कथा के चौथे दिन बीएपीएस श्री स्वामीनारायण मंदिर कापसी फाटा कुक्षी* में कथा वक्ता डॉ विवेकनिष्ठ स्वामी जी ने अयोध्या के अरण्यकांड में माता शबरी की सच्ची भक्ति का वर्णन करते हुए बताया कि एक बार संत जनों का शबरी आश्रम में आगमन हुआ, उन्होंने भीलनी शबरी को देखकर मुंह बिगाड़ते हुए सरोवर की ओर स्नान करने को चले गए, लेकिन जाकर देखा तो पूरे सरोवर का पानी रक्त की तरह लाल होकर दुर्गंध कर रहा था। तब संतों ने ईश्वर से प्रार्थना की कि ईश्वर हम ऐसे सरोवर में कैसे स्नान कर पाएंगे? इसे शुद्ध करो। तब प्रभु ने उन्हें कहा कि आपने मेरे सच्चे भक्त शबरी का अपमान किया है। शबरी के चरण स्पर्श से ही यह सरोवर शुद्ध हो सकता है। तब संतों ने अपनी गलती को मानते हुए माता शबरी से प्रार्थना की और माता शबरी ने जैसे ही आकर सरोवर में स्नान किया पूरे सरोवर का जल शुद्ध हो गया। इससे हमें पता चलता है कि भगवान को केवल सच्ची भक्ति पसंद है। जात-पात, पद- प्रतिष्ठा से कोई मोह नहीं है! शबरी भले भीलनी थी, लेकिन अपनी गुरु आज्ञा के कारण 16 वर्ष से लेकर 86 वर्ष कुल 70वर्ष तक भगवान श्री राम आएंगे इस गुरु के कथन में सच्चा विश्वास रखकर भगवान राम का इंतजार करती रही। प्रभु श्री राम आए और उन्होंने प्रेम पूर्वक शबरी के झूठे बेर भी खाएं। उन्हें मोक्ष प्रदान करते हुए कहा कि हम आपसे प्रसन्न है कुछ मांगो। तब शबरी ने *भगवान से नवधा भक्ति मांगी* भगवान ने उन्हें नवधा भक्ति के नौ अंग
*1) संतों का सत्संग*
*2) भगवान की कथाओं में प्रेम*
*3) गुरु की सेवा*
*4)भगवान के गुणों का गान*
*5) भगवान का मंत्र जाप*
*6) इंद्रियों का संयम*
*7)हर जीव में परमात्मा को देखना*
*8)यथा लाभ संतोष*
एवं

9)समर्पण* रूपी नवधा भक्ति प्रदान की !
आगे पंचवटी में देवर्षि नारद को सच्चे संतों के लक्षण बताते हुए प्रभु श्री राम ने कहा है कि *सत्यवादी, परोपकारी, विनम्र, ईश्वर भक्ति में लीन, सुख- दुख से परे, सदाचारी, ज्ञानवान एवं सच्चे भक्त*
ऐसे संतो के बस में रहता हूं और उनके हृदय में निवास करता हूं !
बाद में अयोध्या आने पर भारत जी के पूछने पर भी संत असंत की परीक्षा कैसे करें ??
तब भगवान राम ने कहा की *कुल्हाड़ी और चंदन की बात में आपको बतलाता हूं* कुल्हाड़ी का स्वभाव है पेड़ को काटना और चंदन का स्वभाव है अपनी खुशबू से महकना!
वह काटने वाली कुल्हाड़ी को भी महका देता है। इसीलिए वह भगवानों के मस्तक पर सुशोभित होता है। और कुल्हाड़ी अपने गुण के कारण बार-बार आग में तपती है और लोहे के हथौड़े से पीटी जाती है। इसलिए हमें हमेशा सच्चे संत का संग करना चाहिए।
प्रभु के प्रेम से विमुख होने के कारण ही वैभवशाली, पराक्रमी, प्रकांड पंडित, भगवान शिव के अनन्य भक्त, होते हुए भी ब्राह्मण कुल में जन्मे रावण को असद गति प्राप्त हुई और पूरे कुल का नाश करवा बैठा। इसलिए कभी भी हमें ईश्वर से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। माता सीता की पवित्रता एवं मर्यादा का ही फल है कि जब उन्होंने भगवान राम को लव- कुश को सौंपते हुए यह प्रतिज्ञा की कि अगर मेरे सतीत्व में शक्ति है तो धरती मां मुझे अपनी गोद में ले लो और माता सीता के प्रताप से धरती मां ने तुरंत माता सीता को अपने गोद में ले लिया! *बीएपीएस श्री स्वामीनारायण संप्रदाय मे भी भगवान श्री स्वामीनारायण ने संतों को पंचवर्तमान* के नियमों का पालन करने की आज्ञा की है! बीएपीएस के संत इन नियमों का पालन कर सत्संग का विस्तार कर रहे हैं इसी कारण आज यह संस्था देश नहीं विदेश बल्कि पूरी दुनिया में अपनी धर्म ध्वजा लहरा रही है।
*आज की इस रामचरितमानस कथा में 2000 से भी अधिक भक्तों ने सत्संग एवं भोजन प्रसादी का लाभ प्राप्त किया।*
जय स्वामीनारायण



