February 9, 2026 |
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प्रदेश के खरगोन जिले से, जहां शिक्षा विभामध्यग में सालों से चला आ रहा भ्रष्टाचार आखिरकार कोर्ट की

फ़ास्ट न्यूज़ जनता की आवाज़ प्रधान संपादक सज्जाद खान

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प्रदेश के खरगोन जिले से, जहां शिक्षा विभामध्यग में सालों से चला आ रहा भ्रष्टाचार आखिरकार कोर्ट की कठघरे में पहुंच गया है।

मुख्य खबर:
जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी) शैलेन्द्र कानूड़े पर वाहन किराया और डीजल भुगतान में बड़े पैमाने पर घोटाले किए हैं। ये घोटाले इतने मजबूत हैं कि न्यायालय ने सीधे पुलिस को विस्तृत जांच के आदेश दे दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
खरगोन जिला मुख्यालय पर जिला पंचायत सीईओ और कलेक्टर के अधीन कार्यरत डीपीसी शैलेन्द्र कानूड़े, जो मूल रूप से शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं, तथा सहयोगी रमेश आरस (एपीसी वित्त) और नानूराम मालवीय (लेखापाल) पर आरोप है कि उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान जैसे संवेदनशील कार्यक्रम के दौरान सरकारी धन का भारी दुरुपयोग किया।
आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार:
शकुंतला जमरे और उदयदत्त (इंदौर निवासी) जैसे व्यक्तियों को कई महीनों तक मासिक वाहन किराया (12,000 से 26,000 रुपये तक) के साथ डीजल राशि का भुगतान किया गया।
उदाहरण के लिए:
नवंबर 2012: 12,125 रुपये
जनवरी 2013: 26,408 रुपये
और इसी तरह 2014 तक कई महीनों में लाखों रुपये निकाले गए।
लेकिन सबसे बड़ा खुलासा – डीजल के कोई वैध बिल कार्यालय रिकॉर्ड में उपलब्ध ही नहीं हैं!
कुछ वाहनों के फर्जी बिल, फर्जी लॉगबुक तैयार किए गए।
कई वाहन आरटीओ में पंजीकृत ही नहीं थे, फिर भी लाखों का भुगतान कर दिया गया।
ये सब शासकीय वित्तीय नियमों का खुला उल्लंघन है।
शिकायतों पर प्रशासन की चुप्पी
शिकायतकर्ता दिनेश खेड़े ने कलेक्टर, कमिश्नर, सचिव स्कूल शिक्षा विभाग भोपाल तक प्रमाणों के साथ लिखित शिकायतें कीं। लेकिन अफसरों ने मौन साध लिया। कोई जांच नहीं, कोई कार्रवाई नहीं। प्रशासन की इस अनदेखी ने भ्रष्टाचार को और बल दिया।
कोर्ट का सख्त फैसला
प्रशासनिक रवैये से तंग आकर शिकायतकर्ता दिनेश खेड़े ने न्यायालय का रुख किया। न्यायालय ने शिकायतकर्ता के कथन और प्रस्तुत दस्तावेजों का अवलोकन कर मामले में विस्तृत अनुसंधान जरूरी माना।
कोर्ट ने थाना प्रभारी खरगोन को स्पष्ट आदेश दिया है कि वे स्वयं या किसी अनुभवी/वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के माध्यम से इस मामले की गहन जांच करें। इस मामले में एडवोकेट रमेश गंगारे ने शिकायतकर्ता की ओर से पैरवी की।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
यह आदेश एक मिसाल है – “न्याय देर से सही, लेकिन मिलता जरूर है।” अब सारी नजरें पुलिस पर टिकी हैं। क्या पुलिस कोर्ट के आदेश का ईमानदारी से पालन करेगी? या फिर यह मामला भी दबाव और फाइलों में दब जाएगा?
यह सिर्फ वाहन किराया-डीजल का मामला नहीं है। यह बड़ा सवाल है:
प्रशासनिक जवाबदेही का
शिक्षा विभाग की साख का
और कलेक्टर के अधीन बैठे अफसरों की कार्यप्रणाली का
क्या कानून जीतेगा, या भ्रष्टाचार एक बार फिर बच निकलेगा?

रिपोर्टर दिनेश खेड़े मंडलेश्वर,


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